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महाभारत की लड़ाई में लाखों सैनिकों के लिए भोजन का प्रबंद कैसे होता था ?

सवाल वास्तव में स्वाभाविक है और जटिल भी! हर दिन इतने योद्धाओं को क्या खिलाते होंगे ? हस्तिनापुर रणभूमि से योजनो दूर है, स्वाभाविक है कि घर से भोजन नहीं आता होगा !

Mahabharat yudh mein bhojan kon banata tha यह सवाल आपके दिमाग में कभी ना कभी आया होगा। करीब पांच हजार साल पहले कुरुक्षेत्र के मैदानी इलाके में हस्तिनापुर में एक ही परिवार के दो भाइयों के बीच लड़ी गई, महाभारत की लड़ाई दुनिया के इतिहास की एक अनोखी घटना थी।

कौरव की 11 अक्षौहिणी सेना और पांडव की 7 अक्षौहिणी सेना के बीच 18 दिनों तक चले इस युद्ध की विशालता का अनुमान लगाना मुश्किल है। लगभग 5,000,000 योद्धा युद्ध के मैदान पर उतरे! लेकिन सवाल ये है की इतने सारे लोगों के भोजन का क्या?

सवाल वास्तव में स्वाभाविक है और जटिल भी! हर दिन इतने योद्धाओं को क्या खिलाते होंगे? हस्तिनापुर रणभूमि से योजनो दूर है, यह स्वाभाविक है कि घर से भोजन नहीं आता होगा! स्वाभाविक है रणभूमि में भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती होगी। लेकिन इतने सारे सैनिकों के लिए भोजन उपलब्ध कराना कोई आसान काम नहीं था! युद्ध की शुरुआत में, सैनिकों की संख्या 50 लाख थी। इसके अलावा, हर दिन हजारों सैनिक युद्ध में मारे जाते थे। इसलिए हर दिन जीवित रहने वाले सैनिकों की संख्या के अनुसार भोजन को बनाना पड़ता है।

कुन्तीपुत्र अर्जुन, महारथी भीष्म, अंगराज कर्ण या आचार्य द्रोणाचार्य एक धनुष-बाण से हजारों सैनिकों की जान ले लेते थे, तो रात का खाना बनाने वाले को उस तरह खाना कम करना पड़ता है!

लेकिन सवाल भी यह है कि इस संख्या की गणना कैसे की जाए? वह काम असंभव था। हालाँकि, कुरुक्षेत्र की लड़ाई में, सैनिकों को हमेशा इन सभी चीजों को ध्यान में रखते हुए भोजन परोसा जाता था! भोजन हमेशा सैनिकों की संख्या के अनुसार पकाया जाता था और भोजन कम ओर ज्यादा नहीं होता था! यह कैसे संभव हुआ? किसने किया ? इस जटिल प्रश्न का बहुत ही रोचक जवाब है

कौन बनाता था इतने सैनिको का खाना ?

हम सभी जानते हैं कि दो व्यक्तियों ने सीधे सीधे महाभारत की लड़ाई में भाग नहीं लिया था। एक बलराम था और दूसरा रुक्मी (भगवान कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी का भाई) था। बहुत कम लोग जानते हैं कि इसके अलावा एक तीसरा व्यक्ति भी इस युद्ध में तटस्थ था। वह उडुपी के महाराजा थे (उडुपी कर्नाटक में स्थित है)।

महाभारत के युद्ध के लिए प्राप्त निमंत्रण को स्वीकार करते हुए, उडुपी के राजा लड़ने के लिए एक सेना के साथ आए। लेकिन जब वह यहां आए, तो उन्होंने देखा कि पांडवों और कौरवों के बीच उनकी सेना को अपने पक्ष में रखने के लिए भारी तनाव था। इसके अलावा, यह भाइयों के बीच युद्ध था तो पक्ष पात भी नहीं कर सकते थे। इस प्रकार उडुपी के महाराजा कटु हो गए और युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया।

फिर उडुपीराज भगवान कृष्ण से मिले और कहा, वासुदेव! यदि आप आदेश देते हैं तो मैं और मेरे सैनिक कुरुक्षेत्र में सेना के लिए भोजन उपलब्ध कराने के लिए तैयार हैं। उदुपीराज के इस विचार से कृष्ण बहुत प्रभावित हुए। उनके पास आया विचार सराहनीय और बुनियादी था। भगवान ने अनुमति दी।

भोजन ज्यादा कम नहीं होने का कारण ?

युद्ध के बाद महाराज युधिष्ठिर ने उडुपीराज से सवाल किया की आपने इतनी सटीकता से कैसे सभी के भोजन की व्यवस्था की ? जबकि हर रोज युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले सैनिको की संख्या अनगिनत थे

युधिष्ठिर से पूछे गए सवाल के सामने, उदुपीराज ने भी पूछा, “धर्मराज! आपके पास 7 अक्षौहिणी सेना थी और विपरीत दिशा में कौरव की 11 अक्षौहिणी थी। दुर्योधन की सेना आपसे संख्या ज्यादा थी, लेकिन आप जीत गए। इसका श्रेय किसे जाता है?

“बेशक, भगवान कृष्ण को!” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया।
“तो इनके सिवा और किसका काम हो सकता है ?” मुस्कुराते हुए उडुपीनरेश ने ये बात सब के सामने रखी

युद्ध के बाद हर रात, मैं वासुदेव के शिबिर में जाता और उनके सामने मूंगफली रख देता था। वो जीतनी मूंगफली खाते थे उसके हजारगुना सैनिक वीरगति को प्राप्त हो जाते थे। में समाज जाता था की मुझे उतने सैनिको का भोजन नहीं बनाना है।

“अगर वासुदेव 10 मूंगफली खाते हैं तो इसका मतलब है कि उनका हजारगुना, यानी कल के युद्ध में 10,000 सैनिक वीरगति को प्राप्त होने वाले हैं, इसलिए हमें उनका खाना बनाने की जरूरत नहीं है!”

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